Sunday, November 18, 2007

पीठ पर न लादें जॉब स्ट्रेस का शैतान

हम जब काम करते हैं, तो उस काम के प्रभावों को भी अपने साथ लेकर घूमते हैं। अगर हमें उस काम से खुशी मिलती है, तो वह ज्यादा देकर तक नहीं चल पाती। पर उस काम के तनाव को हम हर वक्त अपने साथ लेकर चलते हैं। जब हम अपने बच्चे से प्यार कर रहे हैं, जब हम दुकान से सब्जी ले रहे होते हैं या जब हम कुछ नहीं कर रहे होते, बस घर के एक अंधेरे कोने में चुप पड़े रहते हैं, तब भी। यह जॉब स्ट्रेस है। कामकाजी लोगों की सेहत के लिये सबसे बड़ा खतरा। वैज्ञानिक कहते हैं कि नौकरीपेशा लोगों को होने वाली बीमारियों की जड़ में यही तनाव है। सिरदर्द, डिप्रेशन, चिड़चिड़ापन, पेट या पीठ की समस्याएं आदि-आदि। यह तो तय है कि आपको नौकरी करनी ही है, क्योंकि उसके बिना गुजारा संभव नहीं और काम है, तो उसमें कभी सफलता भी मिलेगी और असफलता भी। फिर जॉब स्ट्रेस से कैसे बचा जा सकता है। इसके लिये कोई कैप्सूल या टैबलेट नहीं मिलती। यह आत्मसंयम से दूर भागता है। हम कितना भी पैसा कमा लें, पर हमें हमेशा शांति की जरूरत होती है। कई लोगों को देखा होगा कि वे अपनी क्षमता से कम पैसों में भी किसी जगह काम कर लेते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि इस जगह पर काम करने के दुष्प्रभाव कम हैं। वे जानते हैं कि दूसरी जगह भले ज्यादा पैसे मिल जाएं, पर जो खून जलेगा, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। कई जगहों पर आपने देखा होगा कि छोटे कर्मचारी मसलन प्यून वगैरह छोटी सी डांट पर नौकरी छोड़ कर चले जाते हैं। वे यह भी नहीं सोचते कि नई नौकरी कैसे पाएंगे। उनमें यह आत्मविश्वास होता है। महीना भर वे खाली बैठते हैं और दूसरी जगह नौकरी पा जाते हैं। इस बीच वे कितना भी संघर्ष करते हैं, लेकिन वे काम के वक्त परिसर में किट-किट नहीं बर्दाश्त कर पाते। जबकि बड़े कर्मचारी ऐसा नहीं कर पाते। वे किटकिट को सहते रहते है, उससे बचने के तरीके खोजते रहते हैं और उस तनाव को पालते रहते हैं। शाम होने पर उन्हें गिनना पड़ता है कि आज दिन की उपलब्धियां क्या रही और कुछ नहीं हासिल हो पाता। कहने का मतलब यह नहीं कि बिना सोचे समझे नौकरी छोड़ दी जाए, पर यह जरूरी है कि अगर किटकिट हो रही हो, तो उसे तुरंत सलटाने का प्रयास किया जाए या फिर उसे दफ्तर में छोड़कर लौटा जाए। उसे अपने साथ लेकर घूमना अपनी पीठ पर शैतान को लाद कर ले चलने जैसा है। मौका मिलते ही वह आपको अपना ही नुकसान कर देने के लिये उकसाएगा। नौकरी छोड़ना विकल्प हो सकता है, समझदारी इसी बात में है।

2 comments:

शास्त्री जे सी फिलिप् said...

बेहद जनोपयोगी लेख. इसे एक या दो दिन में प्रकाशित सारथी चिट्ठा अवलोकन 10 मे लिस्ट किया जायगा -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

Mired Mirage said...

बहुत अच्छा लेख लिखा है ।
घुघूती बासूती